मानव भव में चाबी रूपी कोई तत्व है तो वो अपना मन है

श्री गुरु प्रेम शताब्दी महोत्सव समिति

प. पू. तपगछाधिपती आचार्य श्री वि. प्रेम सूरिश्वर जी महाराज साहब के शताब्दीवर्ष में समस्त मुंबई के 100 संघो की विचरण यात्रा के अंतर्गत प. पु. आ. श्री कुलचंद्रसूरिश्वर जी (k.c) म. सा. आदि ठाना श्री वर्धमान नगर जैन संघमें पधारे । 

श्री वर्धमान नगर जैन संघमें  प्रथम प्रवचन तथा विजन पैराडाइज़ में दूसरे प्रवचन का आयोजन था।

पहले प्रवचन में, पूज्यश्री ने  भ्रमना अर्थात् भ्रान्ति के बारे में  फ़रमाया के हम जिसे सुख मानते हैं वो सुख की  भ्रांति है अर्थात मिथ्यभास है मनुष्य इस बात को समझता नहीं है और निरंतर इसके पीछे दौडता रहता है ।

आचार्य श्री ने भ्रम के विषय में विस्तार से बताया।

दूसरे प्रवचन में  आचार्य श्री  ने मन के विषय पर समझाया कि यदि मानव  भव में  चाबी रूपी कोई तत्व है तो वो अपना मन है।

जिसने मन जीता उसने सब कुछ जीत लिया।मन से जीवन रुपी ताला खुल भी सकता है और बंद भी हो सकता है। ये सबसे महत्वपूर्ण बात है । ऐसे पूज्य श्री ने पाँच प्रकार के मन की बात समझायी। आचार्य श्री ने फरमाया कि हमने अब तक दूसरों की बहुत शोध की परंतु अब हमें स्वयं की और अपने मन की शोध करनी है।

आज संध्याकाल मुलुंड के एमएलए श्री सरदार तारा सिंह जी आचार्य श्री के दर्शन हेतू पधारे तथा पूज्य श्री के आशीर्वाद को प्राप्त किया।

पूज्य श्री आज और कल 14 और 15 फरवरी टेम्बि नगर  (थाणा) में स्थिरता करेंगे